(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.226. अध्यायः 226
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति तपउपवासादिनिरूपणम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-226-0x(6133)(74238)
द्विजातयो व्रतोपेता यदिदं भुञ्जते हविः।
अन्नं ब्राह्मणकामाय कथमेतत्पितामह॥ 12-226-1(74239)
भीष्म उवाच। 12-226-2x(6134)
अवेदोक्तव्रतोपेता भुञ्जानाः कार्यकारिणः।
वेदोक्तेषु च भुञ्जाना व्रतलुब्धा युधिष्ठिर॥ 12-226-2(74240)
युधिष्ठिर उवाच। 12-226-3x(6135)
यदिदं तप इत्याहुरुपवासं पृथग्जनाः।
एतत्तपो महाराज उताहो किं तपो भवेत्॥ 12-226-3(74241)
भीष्म उवाच। 12-226-4x(6136)
मासपक्षोपवासेन मन्यन्ते यत्तपो जनाः।
आत्मतन्त्रोपधातस्तु न तपस्तत्सतां मतम्॥ 12-226-4(74242)
त्यागश्च सन्नतिश्चैव शिष्यते तप उत्तमम्।
सदोपवासी स भवेद्ब्रह्मचारी सदा भवेत्॥ 12-226-5(74243)
मुनिश्च स्यात्सदा विप्रो दैवतं च सदा भवेत्।
कुटुम्बिको धर्मपरः सदाऽस्वप्नश्च भारत॥ 12-226-6(74244)
अमांसादी सदा च स्यात्पवित्री च सदा भवेत्।
अमृताशी सदा च स्यान्न च स्याद्विषभोजनः॥ 12-226-7(74245)
विधसाशी सदा च स्यात्सदा चैवातिथिप्रियः।
[श्रद्दधानः सदा च स्याद्देवताद्विजपूजकः]॥ 12-226-8(74246)
युधिष्ठिर उवाच। 12-226-9x(6137)
कथं सदोपवासी स्याद्ब्रह्मचारी कथं भवेत्।
विघसाशी कथं च स्यात्सदा चैवातिथिप्रयिः॥ 12-226-9(74247)
भीष्म उवाच। 12-226-10x(6138)
अन्तरा प्रातराशं च सायमाशं तथैव च।
सदोपवासी स भवेद्यो न भुङ्क्तेऽन्तरा पुनः॥ 12-226-10(74248)
भार्यां गच्छन्ब्रह्मचारी ऋतौ भवति ब्राह्मणः।
ऋतवादी भवेन्नित्यं ज्ञाननित्यश्च यो नरः॥ 12-226-11(74249)
न भक्षयेद्वृथा मांसममांसाशी भवत्यपि।
दाननित्यः पवित्रीस्यादस्वप्नश्च दिवाऽस्वपन्॥ 12-226-12(74250)
भृत्यातिथिषु यो भुङ्क्ते भुक्तवत्सु सदा नरः।
अमृतं केवलं भुङ्क्ते इति विद्धि युधिष्ठिर॥ 12-226-13(74251)
अभुक्तवत्सु भुञ्जानो विषमश्नाति वै द्विजः।
अदत्त्वा योऽतिथिभ्योऽन्नं न भुङ्क्ते सोतिथिप्रियः।
`अभुक्त्वा दैवतेभ्यश्च यो न भुङ्क्ते सदैवतम्' 12-226-14(74252)
देवताभ्यः पितृभ्यश्च भृत्येभ्योऽतिथिभिः सह।
अवशिष्टं तु योऽश्नाति तमाहुर्विघसाशिनम्॥ 12-226-15(74253)
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने ब्रह्मणा सह।
उपस्थिताश्चाप्सरोभिः परियान्ति दिवौकसः॥ 12-226-16(74254)
देवताभिश्च ये सार्धं पितृभ्यश्चोपभुञ्जते।
रमन्ते पुत्रपौत्रैश्च तेषां गतिरनुत्तमा॥ ॥ 12-226-17(74255)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि षङ्विशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 226॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-226-1 द्विजातयस्त्रैवर्णिकाः। हविर्देवताशेषम्॥ 12-226-2 भुज्जाना अभोज्यं मांसादीति शेषः। कार्यकारिणः कामाचारवन्तः। इहैव सतिता इत्यर्थः। व्रतलुब्धा दीक्षोक्तफलानुरागिणः स्वर्गं प्राप्य पतिष्यन्तीत्यर्थः॥ 12-226-4 ह्यत्मतन्त्रमात्मविद्या तस्या उपघातो विघ्नः॥ 12-226-5 भूतभयंकरकर्मसंन्यासस्त्यागः। सन्नतिर्भूताराधनम्॥ 12-226-7 अमृताशी सदा च स्याद्देवतातिथिपूजकः इति झ. ड. पाठः॥ 12-226-9 अतिथिर्वैश्वदेवान्ते प्राप्तः॥ 12-226-12 वृथा देवपितृशेषं विना॥ 12-226-14 अभुक्तवत्सु नाश्नानः सततं यस्तु वैद्विजः। अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत्तेति झ. पाठः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.